ગુજરાત

मनरेगा योजना पर संकट: गुजरात में 5 सालों में 8.14 लाख मजदूर बाहर, ₹132 करोड़ का भुगतान अभी भी बकाया

गुजरात में ग्रामीण गरीबों को उनके ही गांव में आजीविका और रोजगार देने के सरकारी दावों के बीच एक चौंकाने वाली स्थिति सामने आई है। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना मनरेगा (MGNREGA) राज्य में गरीबों को टिकाऊ रोजगार देने में सुस्त साबित हो रही है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों के भीतर गुजरात में मनरेगा के तहत काम करने वाले 8.14 लाख मजदूर इस योजना से बाहर हो गए हैं। वर्ष 2021-22 में जहां 18.43 लाख श्रमिकों को रोजगार मिला था, वहीं वर्ष 2025-26 तक यह संख्या घटकर मात्र 10.29 लाख रह गई है। समय पर उचित पारिश्रमिक न मिलने और कम मजदूरी दर के कारण ग्रामीण मजदूर अपने गांवों से शहरों की ओर पलायन (Migration) करने को मजबूर हो रहे हैं।

दूसरी ओर, योजना के क्रियान्वयन में प्रशासनिक ढिलाई, फर्जी जॉब कार्ड (Job Card) और धांधली के गंभीर आरोप भी सामने आ रहे हैं। पंचमहल सहित राज्य के कई जिलों में अनियमितता की शिकायतें दर्ज की गई हैं। इस बीच केंद्र सरकार के आंकड़ों से खुलासा हुआ है कि मजदूरों के वेतन और निर्माण सामग्री (Material) के पेटे अभी भी ₹132 करोड़ का बकाया भुगतान (Pending Payment) बाकी है। ग्रामीणों को 100 दिनों का गारंटीकृत रोजगार (Guaranteed Employment) देने वाली यह कल्याणकारी योजना बजटीय कटौती और प्रशासनिक उदासीनता के चलते वर्तमान में केवल एक औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह गई है।

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