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गुजरात हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सहमति से बने और समाप्त हुए लिव-इन रिलेशनशिप में दुष्कर्म का केस नहीं

गुजरात हाईकोर्ट (Gujarat High Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि जब दो वयस्क व्यक्ति आपसी सहमति से लिखित समझौते के तहत साथ रहते हैं और बाद में किसी लिखित करार (Written agreement) के जरिए ही अपने संबंधों को समाप्त करते हैं, तो शादी के झूठे वादे के आधार पर पीड़िता का दुष्कर्म (Rape allegations) का दावा बनाए रखना मुश्किल हो जाता है। जस्टिस इलेश जे. वोरा और जस्टिस आर. टी. वाच्छाणी की खंडपीठ ने पीड़िता महिला की अपील को खारिज करते हुए आरोपी पुरुष को बरी करने के ट्रायल कोर्ट (Trial court verdict) के फैसले को बरकरार रखा। पीठ ने साफ किया कि अगर शादी का वादा शुरुआत से ही धोखे की मंशा से दिया गया हो तो कानूनी स्थिति अलग हो सकती है, लेकिन आपसी सहमति से लंबे समय तक साथ रहने के बाद केवल विवाह से इनकार करने पर पुरुष के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही (Criminal proceedings) नहीं चलाई जा सकती।

हाईकोर्ट ने अपने अवलोकन में कहा कि आधुनिक समय में महिलाएं आर्थिक रूप से स्वतंत्र (Financially independent) हैं और अपनी शर्तों पर फैसले लेने में सक्षम हैं, जिससे लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in relationship) का चलन बढ़ा है। कोर्ट ने पाया कि दोनों पक्षों के बीच वर्ष 2020 में हुए दूसरे समझौते में भी बिना किसी दबाव या जबरदस्ती के आपसी मर्जी से अलग होने का उल्लेख था। इस दस्तावेज में किसी भी प्रकार की मारपीट, धमकी या बलपूर्वक शारीरिक संबंध बनाने के आरोप नहीं थे। अदालत ने टिप्पणी की कि आपसी मतभेदों के कारण संबंध खत्म होने पर उसे केवल आपराधिक रंग (Criminal action) देना उचित नहीं है, जिससे यह ऐतिहासिक फैसला देश भर के लिव-इन मामलों के लिए नजीर बन गया है।

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