सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी नहीं कर सकते नियमित कर्मचारियों के समान वेतन का दावा
सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी एजेंसी या ठेकेदार (Contractor) के माध्यम से अनुबंध पर रखे गए कर्मचारी सरकारी विभागों के नियमित कर्मचारियों के साथ समानता का दावा नहीं कर सकते। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें अनुबंध पर काम करने वाले सफाई कर्मचारियों को नियमित कर्मचारियों के समान वेतन और भत्ते (Allowances) देने का आदेश दिया गया था। अदालत ने कहा कि सरकारी नौकरी एक ‘सार्वजनिक संपत्ति’ (Public Property) है और इस पर देश के हर योग्य नागरिक का समान अधिकार है, जिसे केवल एक पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है।
अदालत ने अपने अवलोकन (Observation) में जोर दिया कि नियमित नियुक्तियाँ एक खुली और निष्पक्ष प्रक्रिया के तहत की जाती हैं, जबकि अनुबंध आधारित नियुक्तियाँ अक्सर एजेंसी की मर्जी पर निर्भर होती हैं। यदि इन दोनों श्रेणियों के बीच का अंतर खत्म कर दिया जाए, तो भर्ती की विभिन्न पद्धतियों की पवित्रता (Sanctity) समाप्त हो जाएगी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नियमित भर्ती प्रक्रिया में पक्षपात रोकने के लिए कई सुरक्षा पहलू होते हैं ताकि केवल योग्यता (Merit) के आधार पर चयन हो सके। इस निर्णय से यह साफ हो गया है कि आकस्मिक या अनुबंध आधारित व्यवस्था को स्थायी नौकरी के समकक्ष नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह पारदर्शी सरकारी भर्ती नियमों का उल्लंघन (Violation) होगा।

