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गुजरात हाई कोर्ट की दो टूक: आपातकालीन सहायता के लिए बना संगठन पुलिस की जगह नहीं ले सकता

गुजरात हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में राज्य के होमगार्ड दल में कार्यरत जवानों द्वारा पुलिस कर्मचारियों के समान वेतन और अन्य लाभों की मांग करने वाली याचिकाओं को खारिज (Dismissed) कर दिया है। जस्टिस मौलिक जे. शेलत की बेंच ने स्पष्ट किया कि होमगार्ड जवानों की नियुक्ति एक ‘मानद सेवा’ (Honorary Service) के रूप में होती है, न कि नियमित सरकारी नौकरी के तौर पर। अदालत ने सरकार की उस दलील को स्वीकार कर लिया जिसमें कहा गया था कि पुलिस और होमगार्ड के कर्तव्यों की प्रकृति और कार्यशैली पूरी तरह अलग है। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि होमगार्ड एक स्वैच्छिक संगठन (Voluntary Organization) है, जिसकी स्थापना केवल संकट के समय पुलिस की सहायता के उद्देश्य से की गई थी।

अदालत ने अपने निर्णय में ‘समान काम, समान वेतन’ के सिद्धांत (Principle) को लागू करने से इनकार करते हुए कहा कि होमगार्ड की सेवाएं स्थायी या बारहमासी नहीं मानी जा सकतीं। बॉम्बे होमगार्ड्स एक्ट-1947 के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए बेंच ने बताया कि पुलिस कर्मचारियों की भर्ती कानूनन नियमित प्रक्रिया (Regular Process) से होती है और उनके कार्य के घंटे व जिम्मेदारियां अधिक जटिल होती हैं। याचिकाओं में बॉर्डर विंग होमगार्ड्स के समान लाभ देने की मांग भी की गई थी, जिसे हाई कोर्ट ने नामंजूर (Rejected) कर दिया। इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि होमगार्ड जवान पुलिस के समकक्ष दर्जे या समान वित्तीय लाभों (Financial Benefits) के हकदार नहीं होंगे। राज्य सरकार ने कोर्ट के इस रुख का स्वागत किया है, जबकि होमगार्ड संगठन के बीच इस आदेश से मायूसी देखी जा रही है।

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