ईरान जंग में अकेले पड़े डोनाल्ड ट्रंप: सऊदी अरब और नाटो (NATO) ने मदद से किया इनकार
ईरान के साथ चल रहे भीषण युद्ध के तीसरे सप्ताह में प्रवेश करते ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चौतरफा संकट में घिरते नजर आ रहे हैं। युद्ध की शुरुआत में ट्रंप को भरोसा था कि उनके सहयोगी देश इस मिशन (Mission) में उनका साथ देंगे, लेकिन स्थिति इसके बिल्कुल उलट हो गई है। सऊदी अरब सहित अन्य प्रमुख अरब देशों ने इस हमले में अमेरिका का साथ देने से स्पष्ट मना कर दिया है। इतना ही नहीं, पश्चिमी देशों के सैन्य संगठन नाटो (NATO) और यूरोपीय संघ ने भी ईरान के विरुद्ध मैदान में उतरने से इनकार कर दिया है। सहयोगियों के इस अप्रत्याशित (Unexpected) रुख से राष्ट्रपति ट्रंप काफी निराश बताए जा रहे हैं, क्योंकि 15 दिनों के संघर्ष के बाद अब उन्हें अपनी रणनीतिक गलतियों का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।
दूसरी ओर, भारी तबाही झेलने के बाद भी ईरान का मनोबल (Morale) पहले से कहीं अधिक मजबूत दिखाई दे रहा है। यह पूरी दुनिया के लिए आश्चर्य का विषय है कि सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई और 40 शीर्ष सैन्य कमांडरों के मारे जाने तथा आधे से अधिक युद्धपोतों (Warships) के नष्ट होने के बावजूद ईरान का रक्षा तंत्र कमजोर नहीं पड़ा है। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि ईरान की यह मजबूती अमेरिका के लिए एक बड़ी चुनौती (Challenge) बन गई है। ट्रंप प्रशासन अब एक ऐसे भंवर में फंस गया है जहां से बिना किसी वैश्विक समर्थन (Support) के बाहर निकलना मुश्किल लग रहा है। ईरान के इस कड़े रुख और अंतरराष्ट्रीय अलगाव के बीच, अमेरिका के लिए अपनी सैन्य प्रतिष्ठा बचाए रखना अब एक कठिन परीक्षा जैसा है।

