ગુજરાત

गुजरात में मासूमों की सुरक्षा पर संकट: अदालतों में 5,100 से अधिक पोक्सो मामले लंबित, कब मिलेगा बेटियों को इंसाफ?

गुजरात में सुरक्षा के दावों और ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियानों के बीच एक विचलित करने वाली सच्चाई सामने आई है। केंद्र सरकार की ताजा रिपोर्ट (Report) के अनुसार, वर्ष 2020 से 2025 के बीच राज्य में पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत कुल 31,617 मामले दर्ज किए गए हैं, जिसका अर्थ है कि औसतन हर साल 5,000 से अधिक मासूम बच्चियां यौन अपराधों का शिकार हो रही हैं। सबसे अधिक चिंताजनक स्थिति न्याय मिलने में हो रही देरी (Delay) है; राज्य में 35 फास्ट ट्रैक अदालतों के कार्यरत होने के बावजूद, 5,135 मामले अभी भी सुनवाई के इंतजार में लंबित हैं। इनमें से 2,642 मामले तो पिछले दो वर्षों से भी अधिक समय से अदालती कार्यवाही (Judicial Proceedings) में अटके हुए हैं, जिससे न्याय प्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि कानूनी डर के अभाव और न्याय मिलने में विलंभ के कारण अपराधियों के हौसले बुलंद हो रहे हैं। एक समय सुरक्षित माने जाने वाले गुजरात में मासूमों के खिलाफ बढ़ते इन जघन्य अपराधों ने राज्य की कानून व्यवस्था (Law and Order) की स्थिति को उजागर कर दिया है। अभिभावकों में अपनी बेटियों की सुरक्षा को लेकर भारी डर और चिंता (Anxiety) देखी जा रही है, क्योंकि जमीनी हकीकत सरकारी विज्ञापनों और दावों से बिल्कुल अलग नजर आ रही है। अगर न्याय मिलने की प्रक्रिया (Justice Process) में तेजी नहीं लाई गई और अपराधियों को कड़ी सजा नहीं दी गई, तो मासूमों की सुरक्षा केवल कागजी भाषणों तक ही सीमित रह जाएगी। यह स्थिति न केवल प्रशासन बल्कि समाज के लिए भी एक गंभीर चुनौती (Challenge) बन गई है।

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