हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: अदालती कार्यवाही में सिर्फ अंग्रेजी को मंजूरी, गुजराती में दलील देने की याचिका खारिज
गुजरात हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में उस याचिका को खारिज (Dismiss) कर दिया है, जिसमें एक याचिकाकर्ता ने अपनी मातृभाषा गुजराती में दलीलें पेश करने की अनुमति मांगी थी। जस्टिस अनिरुद्ध पी. मायी ने स्पष्ट किया कि हाई कोर्ट की आधिकारिक भाषा (Official Language) अंग्रेजी है, इसलिए सभी न्यायिक कार्यवाही और बहस केवल अंग्रेजी में ही होनी चाहिए। अदालत ने कानूनी प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि किसी अन्य भाषा में प्रस्तुति की अनुमति देना वर्तमान नियमों के विरुद्ध है। यह मामला तब शुरू हुआ जब हाई कोर्ट लीगल सर्विस कमेटी ने याचिकाकर्ता को अंग्रेजी भाषा में कमजोर होने के आधार पर ‘पार्टी-इन-पर्सन’ (Party-in-person) के रूप में दलीलें देने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया था।
अदालत ने सुनवाई के दौरान वर्ष 2015 के एक पुराने फैसले का संदर्भ (Reference) दिया, जिसमें यह तय किया गया था कि उच्च न्यायालय में केवल अंग्रेजी का ही उपयोग होगा। याचिकाकर्ता, जो केवल 10वीं कक्षा पास है, का तर्क था कि अंग्रेजी का आग्रह करना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन (Violation) है। हालांकि, हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को पहले ही कानूनी सहायता (Legal Aid) के लिए वकील आवंटित किया गया है, जो उनके पक्ष को अंग्रेजी में प्रभावी ढंग से रख सकते हैं। अदालत के अनुसार, जटिल कानूनी तथ्यों को समझाने के लिए भाषा पर पकड़ अनिवार्य है, अन्यथा न्याय की प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न हो सकती है। अंततः, याचिका में कोई कानूनी मेरिट (Merit) न मिलने पर इसे पूरी तरह रद्द कर दिया गया।

