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मिडल ईस्ट संकट में भारत की ‘शांति दूत’ की भूमिका: एस. जयशंकर ने 6 देशों के विदेश मंत्रियों से की बात, भारतीयों की सुरक्षा सर्वોપરી

ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते सैन्य संघर्ष (Military Conflict) ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है, जिसके बीच भारत ने अत्यंत सावधानीपूर्ण और संतुलित रुख अपनाते हुए शांति की पहल की है। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पिछले 24 घंटों में इजरायल और ईरान सहित कुल 6 देशों के विदेश मंत्रियों के साथ टेलीफोन पर चर्चा की है। इजरायली विदेश मंत्री गिदोन सार के साथ बातचीत में उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी विवाद का स्थायी समाधान केवल कूटनीतिक (Diplomatic) बातचीत से ही संभव है। वहीं, ईरानी विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची के साथ संवाद में भारत ने हमलों और जवाबी हमलों के बढ़ते सिलसिले पर गहरी चिंता व्यक्त की। भारत का मुख्य उद्देश्य इस तनाव को और अधिक बढ़ने से रोकना है ताकि वैश्विक अर्थव्यवस्था और क्षेत्रीय स्थिरता (Stability) बनी रहे।

भारत के लिए इस समय सबसे बड़ी प्राथमिकता खाड़ी देशों में रहने वाले लाखों भारतीय श्रमिकों की सुरक्षा (Security) सुनिश्चित करना है। इस संदर्भ में एस. जयशंकर ने कुवैत, कतर, बहरीन और यूएई के नेतृत्व के साथ सुरक्षा व्यवस्थाओं की समीक्षा (Review) की। बहरीन और यूएई ने भारत को भरोसा दिलाया है कि किसी भी आपातकालीन स्थिति (Emergency) में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाए जाएंगे। विदेश मंत्री ने चेतावनी दी है कि यदि यह संघर्ष और फैला, तो इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक मानवाधिकारों पर पड़ेगा। वर्तमान संकट में सभी प्रमुख खाड़ी देशों का भारत के साथ खड़े रहना एक बड़ी कूटनीतिक जीत (Diplomatic Victory) मानी जा रही है, जिससे भारत एक निष्पक्ष मध्यस्थ और शांति दूत के रूप में उभर कर सामने आया है।

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