गुजरात हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: अब भाई-बहन भी माने जाएंगे ‘परिवार’ का हिस्सा
गुजरात हाईकोर्ट ने मुआवजे (Compensation) के दावों में निर्भरता (Dependency) के दायरे को फिर से परिभाषित करते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि ‘फेटल एक्सीडेंट एक्ट, 1855’ की धारा 1-A के तहत “भाई और बहनों” को भी “परिवार” का हिस्सा माना जाएगा। यह मामला तीन दशक पुरानी एक दुखद घटना से जुड़ा है, जिसमें शयन पुरोहित नाम के एक युवक की अहमदाबाद इलेक्ट्रिसिटी कंपनी (AEC) और गुजरात एनर्जी बोर्ड (GEB) की गंभीर लापरवाही (Negligence) के कारण बिजली का करंट लगने से मौत हो गई थी। मृतक की माता ने मुआवजे के लिए कानूनी संघर्ष शुरू किया था, जो करीब 35 वर्षों तक चला। इस लंबी कानूनी प्रक्रिया (Legal Process) के दौरान माता का निधन हो गया, जिसके बाद मृतक के भाई-बहनों को इस मामले में कानूनी पक्षकार के रूप में शामिल किया गया था।
बिजली कंपनियों ने हाईकोर्ट में यह दलील दी थी कि 1855 के पुराने कानून के अनुसार केवल माता-पिता, पत्नी और बच्चे ही “आश्रित” (Dependent) की श्रेणी में आते हैं, इसलिए भाई-बहनों को मुआवजा पाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। हालांकि, भाई-बहनों की ओर से पैरवी करते हुए वकील ने “टेलीओlogical अप्रोच” (Teleological Approach) यानी उद्देश्यपूर्ण दृष्टिकोण की वकालत की। हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए माना कि कल्याणकारी कानूनों की व्याख्या उसके सामाजिक उद्देश्य (Social Purpose) को पूरा करने के लिए की जानी चाहिए। अदालत ने ‘स्ट्रिक्ट लायबिलिटी’ (Strict Liability) के सिद्धांत को लागू करते हुए बिजली कंपनियों की याचिका खारिज कर दी और यह मिसाल कायम की कि न्याय केवल शब्दों के जाल में नहीं उलझना चाहिए। इस फैसले से अब भविष्य में ऐसे कई मामलों में भाई-बहनों के लिए मुआवजे का कानूनी मार्ग प्रशस्त हो गया है।

