डॉ. अंबेडकर का महासंघर्ष: जब समंदर में डूब गई बाबा साहेब की बौद्धिक संपदा, बड़ौदा नरेश की छात्रवृत्ति ने बदली दलित मसीहा की तकदीर
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जुलाई 1917 में एक दर्दनाक हादसा हुआ, जब अंग्रेजी चैनल से गुजर रहे साल्साटी (SS Salsette) नामक जहाज पर जर्मन सेना ने टॉरपीडो से हमला कर दिया। इस हमले में 15 लोगों की जान गई और साथ ही डॉ. बी.आर. अंबेडकर की वर्षों की मेहनत, उनकी पीएचडी (PhD) की बौद्धिक संपदा और दुर्लभ किताबें भी समुद्र में डूब गईं। गनीमत यह थी कि बाबा साहेब उस वक्त दूसरे जहाज से भारत आ रहे थे, जिससे उनकी जान बच गई। डॉ. अंबेडकर का शुरुआती जीवन चुनौतियों और जातिगत भेदभाव (Discrimination) से भरा था। 1907 में मैट्रिक पास करने के बाद, आचार्य केलुस्कर ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ से उनकी मुलाकात करवाई। महाराजा उनकी बुद्धिमानी से अत्यंत प्रभावित (Impressed) हुए और उन्हें ₹25 प्रतिमाह की छात्रवृत्ति देना शुरू किया।
शिक्षा पूरी करने के बाद जब बाबा साहेब ने बड़ौदा रियासत में नौकरी शुरू की, तो वहां भी उन्हें भारी अपमान और अछूत प्रथा (Untouchability) का सामना करना पड़ा। कोठी कंपाउंड के कार्यालय में काम करते हुए उन्हें रहने और खाने के लिए भीषण कष्ट झेलने पड़े, जिसके कारण उन्होंने नौकरी छोड़ने का कठिन निर्णय (Decision) लिया। ऐसे संकटपूर्ण समय में उन्होंने मुंबई के मालाबार में ठहरे महाराजा सयाजीराव से दोबारा मुलाकात की और अपनी पीड़ा व्यक्त की। महाराजा पहले से ही उनकी परिस्थितियों से अवगत थे और उन्होंने भीमराव के विदेश जाकर उच्च शिक्षा (Higher Education) प्राप्त करने के प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया। यह सहयोग न केवल डॉ. अंबेडकर के व्यक्तिगत विकास के लिए, बल्कि आधुनिक भारत के निर्माण और सामाजिक न्याय (Social Justice) की नींव रखने के लिए भी मील का पत्थर साबित हुआ।

