गुजरात में गहराया ईंधन संकट: अब किसानों को डीजल के लिए दिखाने होंगे सरकारी दस्तावेज
मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध और वैश्विक तनाव के कारण गुजरात में ईंधन की भारी कूटनीतिक और व्यावहारिक कटोती देखने को मिल रही है, जिससे विशेष रूप से सौराष्ट्र, कच्छ और उत्तर गुजरात के पेट्रोल पंपों पर वाहनों की लंबी कतारें (Queues) लग गई हैं। इस विकट स्थिति के बीच राज्य के खाद्य और नागरिक आपूर्ति विभाग ने जमाखोरी रोकने के बहाने एक नया कड़ा नियम जारी किया है। इस नए आदेश के अनुसार, अब यदि कोई किसान ट्रैक्टर या खेती के काम के लिए डीजल खरीदने जाएगा, तो उसे भूमि दस्तावेज जैसे 7-12 और 8(अ) की नकल, चुनाव कार्ड, सरकारी पहचान पत्र (Identity Card) और ट्रैक्टर की आरसी बुक जैसे पुख्ता प्रमाण दिखाने होंगे। इन सभी दस्तावेजों की जांच के बाद भी एक किसान को एक बार में अधिकतम केवल 200 लीटर तक ही डीजल मिल सकेगा, जिससे कृषि कार्यों पर सीधा प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है।
एक तरफ राज्य सरकार लगातार यह दावा कर रही है कि गुजरात में पेट्रोल-डीजल का पर्याप्त स्टॉक (Stock) उपलब्ध है और नागरिकों से अफ़वाहों से बचने की अपील कर रही है, लेकिन दूसरी तरफ जमीनी हकीकत में ईंधन के वितरण पर कड़ा प्रतिबंध लगा दिया गया है। आम उपभोक्ताओं के लिए की गई इस राशनिंग (Rationing) के तहत टू-व्हीलर्स को केवल 50 से 100 रुपये और फोर-व्हीलर्स को मात्र 1,000 रुपये का ईंधन दिया जा रहा है। इस संकट की सबसे गंभीर मार माल परिवहन यानी ट्रांसपोर्ट उद्योग पर पड़ी है, जहां लंबी दूरी तय करने वाले ट्रकों को उनकी आवश्यकता के विपरीत केवल 20 से 25 लीटर डीजल ही मिल पा रहा है। यदि आपूर्ति व्यवस्था को जल्द ही सुचारू (Smooth) नहीं किया गया, तो राज्य की संपूर्ण परिवहन व्यवस्था और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति ठप हो जाएगी, जिससे भारी आर्थिक मंदी का खतरा पैदा हो सकता है।

