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मुफ्त उपहारों से अर्थव्यवस्था खतरे में: एसबीआई की रिपोर्ट में राज्यों के बढ़ते खर्च पर गंभीर चिंता

चुनाव के समय मतदाताओं को लुभाने के लिए राजनीतिक दलों द्वारा किए जाने वाले ‘मुफ्त उपहार’ (Freebies) और बैंक खातों में सीधे नकद जमा करने के वादे अब देश की अर्थव्यवस्था (Economy) के लिए चिंता का विषय बन गए हैं। भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की हालिया शोध रिपोर्ट के अनुसार, राज्यों के सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) का 0.1% से 2.7% तक का भारी हिस्सा इन चुनावी योजनाओं पर खर्च हो रहा है। यह खर्च राज्यों की अपनी कुल राजस्व आय का लगभग 5 से 10% है। रिपोर्ट में यह सिफारिश (Recommendation) की गई है कि इस प्रकार के खर्च की एक निश्चित सीमा तय होनी चाहिए, ताकि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी आवश्यक कल्याणकारी योजनाएं प्रभावित न हों। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि सरकार को लोगों को मुफ्त उपहार देने के बजाय रोजगार के अवसर पैदा करने चाहिए।

एसबीआई की रिपोर्ट में महिला मतदाताओं (Women Voters) से जुड़ा एक दिलचस्प पहलू भी सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, जिन 19 राज्यों में महिला केंद्रित योजनाएं (जैसे लाडली बहना) लागू हैं, वहां महिला मतदाताओं की भागीदारी में औसतन 7.8 लाख का उछाल देखा गया है। इसके विपरीत, जिन राज्यों में ऐसी कोई योजना नहीं है, वहां यह वृद्धि केवल 2.5 लाख तक ही सीमित रही है। हालांकि यह आंकड़े राजनीतिक लाभ (Political Gain) की ओर इशारा करते हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि बिना किसी भेदभाव के सभी को मुफ्त वस्तुएं देना केवल ‘तुष्टिकरण की नीति’ (Policy of Appeasement) है। अदालत का तर्क है कि यदि संसाधन केवल मुफ्तखोरी में खर्च होंगे, तो हाशिए पर खड़े जरूरतमंद लोगों और सक्षम लोगों के बीच का अंतर समाप्त हो जाएगा, जो अंततः देश के विकास में बाधा (Hinderance) बनेगा।

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